पलामू समाचार केंद्र प्रतिनिधि मेदनीनगर पलामू झारखंड +917979886793 भारत की प्रथम प्रैक्टिसिंग महिला चिकित्सक डॉ. कदंबिनी गांगुली की जयंती के अवसर पर नेशनल मेडिकोज़ ऑर्गेनाइजेशन (एनएमओ) द्वारा एक राष्ट्रीय ऑनलाइन अकादमिक वेबिनार का आयोजन किया गया । देश के विभिन्न चिकित्सा महाविद्यालयों के एमबीबीएस विद्यार्थियों, इंटर्न चिकित्सकों तथा युवा डॉक्टरों ने उत्साहपूर्वक इसमें भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय चिकित्सा इतिहास की प्रेरणादायी विभूति डॉ. कदंबिनी गांगुली के जीवन एवं योगदान से नई पीढ़ी को परिचित कराना तथा सड़क दुर्घटनाओं के नैदानिक, विधि-चिकित्सीय (फॉरेंसिक) एवं जनस्वास्थ्य संबंधी प्रबंधन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना था। वेबिनार के प्रथम सत्र में डॉ. धनाकर ठाकुर, एम.डी. (मेडिसिन) ने "पायनियरिंग द पल्स : कदंबिनी गांगुली एंड द डॉन ऑफ इंस्टीट्यूशनल मेडिसिन" विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि 18 जुलाई 1861 को भागलपुर में जन्मी डॉ. कदंबिनी गांगुली भारतीय चिकित्सा इतिहास की सर्वाधिक प्रेरणादायी विभूतियों में से एक थीं। उन्होंने बताया कि वर्ष 1887 में...
पलामू समाचार केंद्र
प्रतिनिधि मेदनीनगर पलामू झारखंड
+917979886793
भारत की प्रथम प्रैक्टिसिंग महिला चिकित्सक डॉ. कदंबिनी गांगुली की जयंती के अवसर पर नेशनल मेडिकोज़ ऑर्गेनाइजेशन (एनएमओ) द्वारा एक राष्ट्रीय ऑनलाइन अकादमिक वेबिनार का आयोजन किया गया । देश के विभिन्न चिकित्सा महाविद्यालयों के एमबीबीएस विद्यार्थियों, इंटर्न चिकित्सकों तथा युवा डॉक्टरों ने उत्साहपूर्वक इसमें भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय चिकित्सा इतिहास की प्रेरणादायी विभूति डॉ. कदंबिनी गांगुली के जीवन एवं योगदान से नई पीढ़ी को परिचित कराना तथा सड़क दुर्घटनाओं के नैदानिक, विधि-चिकित्सीय (फॉरेंसिक) एवं जनस्वास्थ्य संबंधी प्रबंधन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना था।
वेबिनार के प्रथम सत्र में डॉ. धनाकर ठाकुर, एम.डी. (मेडिसिन) ने "पायनियरिंग द पल्स : कदंबिनी गांगुली एंड द डॉन ऑफ इंस्टीट्यूशनल मेडिसिन" विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि 18 जुलाई 1861 को भागलपुर में जन्मी डॉ. कदंबिनी गांगुली भारतीय चिकित्सा इतिहास की सर्वाधिक प्रेरणादायी विभूतियों में से एक थीं। उन्होंने बताया कि वर्ष 1887 में कोलकाता मेडिकल कॉलेज से स्नातक बनने वाली वे पहली भारतीय महिला थीं तथा आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर चिकित्सकीय अभ्यास करने वाली दक्षिण एशिया की प्रथम महिला चिकित्सकों में उनका स्थान अत्यंत अग्रणी है।
डॉ. ठाकुर ने कहा कि डॉ. कदंबिनी गांगुली केवल एक कुशल चिकित्सक ही नहीं थीं, बल्कि महिला शिक्षा, सामाजिक सुधार तथा महिला अधिकारों की प्रबल समर्थक भी थीं। वर्ष 1889 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन को संबोधित करने वाली पहली महिला बनीं। वर्ष 1906 में उन्होंने कोलकाता के प्रथम महिला सम्मेलन की अध्यक्षता कर महिला सशक्तिकरण आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने इंग्लैंड में उच्च चिकित्सा प्रशिक्षण प्राप्त किया तथा चिकित्सा सेवा के साथ-साथ सामाजिक कार्यों और ब्रह्म समाज आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। पारिवारिक उत्तरदायित्वों एवं चिकित्सा सेवा के मध्य आदर्श संतुलन स्थापित कर उन्होंने आने वाली पीढ़ियों की महिला चिकित्सकों के लिए प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया।
अपने व्याख्यान में डॉ. ठाकुर ने सुझाव दिया कि पश्चिम बंगाल के किसी सरकारी चिकित्सा महाविद्यालय का नाम डॉ. कदंबिनी गांगुली के नाम पर रखा जाना चाहिए, जिससे चिकित्सा शिक्षा में उनके ऐतिहासिक योगदान को स्थायी सम्मान प्राप्त हो। उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि 18 जुलाई को "महिला चिकित्सा दिवस" के रूप में मनाने पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज चिकित्सा शिक्षा में छात्राओं की बढ़ती उपलब्धियाँ इस तथ्य का प्रमाण हैं कि चिकित्सा क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका निरंतर सशक्त हो रही है तथा डॉ. कदंबिनी गांगुली जैसी महान विभूतियाँ इस परिवर्तन की प्रेरणा हैं।
वेबिनार के दूसरे सत्र में आनंद महतो, एमबीबीएस ने "रोड ट्रैफिक एक्सीडेंट्स (आरटीए) : नैदानिक एवं जनस्वास्थ्य दृष्टिकोण" विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सड़क दुर्घटनाएँ भारत सहित पूरे विश्व में मृत्यु, विकलांगता तथा आर्थिक क्षति के प्रमुख कारणों में सम्मिलित हैं और प्रत्येक चिकित्सक को अपने व्यावसायिक जीवन में ऐसे रोगियों का उपचार करना पड़ता है।
उन्होंने सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली चोटों का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत करते हुए पैदल यात्रियों तथा वाहन में सवार व्यक्तियों में होने वाली चोटों के अंतर को विस्तार से स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि पैदल यात्रियों की चोटें वाहन से टकराने, वाहन पर गिरने तथा सड़क पर गिरने के विभिन्न चरणों में विकसित होती हैं, जबकि वाहन में बैठे व्यक्तियों की चोटें अचानक गति रुकने, सीट बेल्ट, स्टीयरिंग व्हील, डैशबोर्ड तथा विंडशील्ड से टकराने के कारण उत्पन्न होती हैं। उन्होंने व्हिपलैश इंजरी, स्टीयरिंग व्हील इंजरी, डैशबोर्ड इंजरी, सीट बेल्ट इंजरी तथा विभिन्न प्रकार के कन्कशन (मस्तिष्काघात) को परीक्षा-उन्मुख तथा व्यावहारिक दृष्टिकोण से अत्यंत सरल भाषा में समझाया।
उन्होंने यह भी बताया कि सड़क दुर्घटना के मामलों में चिकित्सक की भूमिका केवल उपचार तक सीमित नहीं होती, बल्कि उचित दस्तावेज़ीकरण, मेडिको-लीगल परीक्षण तथा विधि-चिकित्सीय साक्ष्यों के संरक्षण का भी विशेष महत्व होता है।
व्याख्यान के अंत में सड़क सुरक्षा पर विशेष बल देते हुए हेलमेट, सीट बेल्ट तथा अन्य सुरक्षात्मक उपायों के नियमित उपयोग के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि समय पर उपचार के साथ-साथ दुर्घटनाओं की रोकथाम ही सबसे प्रभावी रणनीति है।
कार्यक्रम का सफल संचालन अमन कुमार, सचिव, नेशनल मेडिकोज़ ऑर्गेनाइजेशन (एनएमओ) ने किया। उन्होंने सभी वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि एनएमओ का उद्देश्य केवल परीक्षा-उन्मुख चिकित्सा शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय चिकित्सा विरासत, नैदानिक उत्कृष्टता, अनुसंधान तथा सामाजिक उत्तरदायित्व को एक सूत्र में जोड़ना भी है। उन्होंने विद्यार्थियों से नियमित रूप से ऐसे अकादमिक कार्यक्रमों में सहभागिता करने का आह्वान किया।
वेबिनार के अंत में प्रतिभागियों ने विषय विशेषज्ञों से प्रश्न पूछकर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। कार्यक्रम का समापन "सेवा ही धर्म" तथा "वन्दे मातरम्" के उद्घोष के साथ हुआ।एन के झा, संस्थापक, पटना पुस्तक मेला ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
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