पलामू समाचार केंद्र पाटन प्रतिनिधि रामाशीष कुमार मो:- 6202682271 नावा बाजार (पलामू) जल संरक्षण पखवाड़ा 2026 के तहत राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय,चेचनहा में जल संरक्षण जागरूकता कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विद्यालय के छात्र-छात्राओं,शिक्षकों एवं विद्यालय प्रबंधन समिति (SMC) के अध्यक्ष व सदस्यों की सक्रिय भागीदारी रही। इस अवसर पर बच्चों द्वारा प्रभात फेरी निकाली गई, जिसमें ग्रामीणों को जल संरक्षण के महत्व के प्रति जागरूक किया गया। छात्र-छात्राओं ने हाथों में जल संरक्षण से जुड़े स्लोगन लिखी तख्तियां लेकर लोगों को पानी बचाने का संदेश दिया। विद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष उपेंद्र कुमार महतो उपस्थित रहे। कार्यक्रम के सफल संचालन में विद्यालय के प्रधानाध्यापक सतीश कुमार की अहम भूमिका रही। वहीं सहायक शिक्षक निशांत भास्कर,राजेश कुमार गुप्ता,संयोजिका शारदा देवी एव उप संयोजिका रामपति देवी, सरिता देवी ने कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कार्यक्रम के दौरान शिक्षकों एवं समिति सदस्यों ने ग्रामीणों को बताया कि जल जीवन का आध...
पलामू समाचार केंद्र
दीपक तिवारी
मेदिनीनगर प्रतिनिधि
छह अप्रैल को क़ानून मंत्रालय ने निर्माताओं-निर्देशकों की अपील सुनने के लिए गठित फ़िल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण (एफसीएटी) को तत्कालीन रूप से भंग कर दिया है.सरकार के इस अमानवीय निर्णय से फ़िल्म इंडस्ट्री के कई निर्माता, निर्देशक और लेखक बेहद नाराज़ हैं. उनका मानना है ऐसा करना उनकी क्रिएटिविटी क्षमताओं को समाप्त करना है.हमें अपने मनचाहे तरीके से काम करने पर रोकने की एक साजिश है .
ज्ञात हो की फ़िल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण (एफसीएटी) की शुरुआत सन 1983 में सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 (1952 का 37) की धारा 5डी के एक वैधानिक निकाय के रूप में किया गया था. जिसका मुख्यालय दिल्ली में था.इस एक्ट के तहत फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक अपनी फ़िल्मों में केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड की कांट-छांट या उन दृश्यों को हटाने की मांग के विरोध में एफसीएटी का दरवाज़ा खटखटाया करते थे .लेकिन एफसीएटी को भंग करने के बाद निर्माता-निर्देशकों को हाईकोर्ट का रुख़ करना होगा.
युवा फिल्म निर्देशक निरंजन भारती ने मीडिया को पत्र जारी कर कहा की फिल्म प्रमाणन न्यायाधिकरण को भंग करना मोदी सरकार के द्वारा लिया गया एक निरंकुश फैसला है जो ठीक वैसे ही है जैसे बिन पानी मछली की होती है . उन्होंने ने अपने पत्र में लिखा की किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए बगैर अपनी बात कहना ग़लत नहीं हैं.
आज से पहले सेंसर बोर्ड के फ़ैसले से जब भी कोई फिल्म निर्देशक , निर्माता नाखुश होते थे तब एफसीएटी के पास जाकर अपनी बात को रखते थे . और वहाँ हमारी बातों को सूना जाता था . और यह सही भी था लेकिन अब ऐसा नहीं हो पाएगा. क्योंकि अब सीबीएफसी ही सर्वोसर्वा होगी .जो अपने मनमाने तरीके से निर्णय करेगी जिसका मैं सख्त ख़िलाफ़ हूँ.
साल 2017 में जब मै अपनी फिल्म सबरंग को सेंसर के लिए भेजा था तब यही सिबिएफ्सी ने अपनी मनमानी करके फिल्म से कई सिन को हटाने पर मजबूर कर दिया था . आग्रह करने के बाद भी किसी ने हमारी बात को नहीं सूना . जिसके बाद हमें वो सारे सिन फिल्म से हटाने पड़े थे .
आगे श्री भारती लिखते हैं की एफसीएटी को भंग करना निश्चित तौर पर सरकार के द्वारा हमलोगों को मनचाहा काम करने से रोकने वाला फ़ैसला है.और फिर इस समय में इस निर्णय की जरुरत क्या थी ? ऐसा क्या आफत या विपत आ गया था की सरकार को यह निर्णय लेना पडा ? और क्या फ़िल्म प्रमाणन की शिकायतों के समाधान के लिए होई कोर्ट के पास इतना समय होगा ? क्या समय पर फिल्म की शिकायतों का निवारण हाई कोर्ट कर पायेगी ? या उन सभी फ़िल्म निर्देशक , निर्माताओं के पास अदालतों का रुख़ करने का साधन होगा ? आप अगर सीधे तौर पर इस केंद्र सरकार के इस निर्णय को समझने की कोसिस करें तो आपको पत्ता चलेगा की एक फिल्म मेकर के लिए कोर्ट के चक्कर लगाने में फ़िल्म बनाने का मक़सद ख़त्म हो जाता है,यानी की करियर चौपट.
मै ऐसा मानता हूँ की सरकार के द्वारा लिया गया यह निर्णय फ़िल्म मेकर्स को बर्बाद करने वाला है .क्योंकि अब निर्देशक और लेखक को लिखने से पहले ये सोचना होगा कि जो मैं लिखने जा रहा हूँ या लिख रहा हूँ उसको सेंसर बोर्ड मंज़ूरी देगा या नहीं. और यहीं से उनकी क्रिएटिविटी ख़त्म हो जाएगी या आप कहें की उनकी जर्नी की अंत हो जाएगी .
फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण क्या है ?
फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण (एफसीएटी), एक वैधानिक निकाय है जो केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के निर्णयों के खिलाफ फिल्म निर्देशक और निर्माताओं की अपील सुनने के लिए स्थापित किया गया था . जब किसी फिल्म के निर्देशक या निर्माता को सेंसर बोर्ड ऑफ़ फिल्म सर्टिफिकेशन के द्वारा फिल्म में कांट छांट या अन्य किसी प्रकार की परेशानी होती थी तो वो अपनी बात रखने के लिए एफसीएटी का दरवाजा खटखटाते थे .
सिनेमैटोग्राफ अधिनियम,1952 ,FCAT कब अस्तित्व में आया?
सन 1983 में कानूनी बिरादरी की अध्यक्षता में सिनेमैटोग्राफ अधिनियम के तहत एक वैधानिक निकाय FCAT की स्थापना किया गया। FCAT से पहले, फिल्म के निर्देशक , निर्माताओं के पास CBFC प्रमाण पत्र या सुझाए गए कटौती के खिलाफ निवारण की तलाश करने के लिए अदालत के सिवा कोई दुसरा विकल्प नहीं था। एफसीएटी के गठन होने के बाद फिल्म के निर्देशक , निर्माताओं के लिए यह निकाय मिल का पत्थर की तरह काम किया.
प्रमाणन प्रक्रिया में FCAT कितना महत्वपूर्ण था?
किसी भी फिल्म मेकर को फिल्म बनाने के बाद उसे सिनेमाघरों में रिलीज़ करने से पहले सेंसर बोर्ड ऑफ़ फिल्म सर्टिफिकेशन में प्रमाणित करने की आवश्यकता होती है . जिसमें आपको अ (अनिर्बंधित) या U- इन फिल्मों को सभी आयु वर्ग के व्यक्ति देख सकते हैं। अ/व या U/A- इस श्रेणी की फिल्मों के कुछ दृश्यों में हिंसा , अश्लील भाषा या यौन संबंधित सामग्री हो सकती है, इस श्रेणी की फिल्में केवल 12 साल से बड़े व्यक्ति किसी अभिभावक की उपस्थिति में ही देख सकते हैं। व ( व्यस्क ) या A - यह वह श्रेणी है जिसके लिए सिर्फ वयस्क यानि 18 साल या उससे अधिक उम्र वाले व्यक्ति ही पात्र हैं। वि (विशेष) या S- यह विशेष श्रेणी है और बिरले ही प्रदान की जाती है. इस दौरान अगर फिल्म के निर्देशक या निर्माता CBFC के प्रमाणन से नाखुश होते हैं या उन्हें कोई परेशानी होती है तो वह एफसीएटी का रूख करते थे .
न्यायाधिकरण को क्यों समाप्त कर दिया गया ?
वित्त राज्य मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर की माने तो FCAT सरकार और जनता के लिए बोझ था जैसा की वो 4 फ़रवरी 2021 को लोकसभा में FCAT सहित चार अन्य न्यायाधिकरण को खत्म करने वाला एक विधेयक पेश करते वक़्त कहा . श्री ठाकुर ने अपने विधेयक में कहा की न्यायाधिकरणों की संख्या को कम करना न केवल जनता के लिए फायदेमंद होगा बल्कि सरकारी खजाने के बोझ को कम करेगा,साथ ही अधिकरण और बुनियादी ढांचे के सहायक कर्मचारियों की कमी के मुद्दे को भी हल करेगा.
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